Wednesday, 19 December 2012

मेरी फितरत

हैं कशाने खूब पर, जाना मेरी फितरत नहीं !

हूँ मैं नाशाद आज जो, इसका उन्हें तो गम नहीं !!

खस्तगी मेरे जहन की, क्यों उन्हें दिखती नहीं !

कूचे मुझे  मेरे सफ़र की, क्यों मुझे दिखती नहीं !!

खुल्द से कम था नहीं तू, फिर मेरी माना  नहीं !

ये जिस्म अब तनहा बचा है, कुछ भी इसमें है नहीं !!



     जितेन्द्र सिंह बघेल
   19th दिसम्बर 2012

Sunday, 16 December 2012

"पाँच बातें "

पाठ - 14
 "पाँच बातें "
कक्षा - 4
1-  हर एक काम इमानदारी से करो !
2- जो भी तुम्हारा भला करे, उसका कहना मानो !
3- अधिक योग्य बने बिना, बड़ों से बराबरी का दावा मत करो !
4- कभी किसी को दिल दुखाने वाली बात मत कहो !
5- जहाँ भी ज्ञान की दो बातें मिलें, उसे ध्यान से सुनो !




याद आया की नहीं ........हरपाल सिंह एवं बूढ़े बाबा की कहानी 

  जितेन्द्र सिंह बघेल 
17th दिसम्बर 2012

Wednesday, 12 December 2012

गम मोहब्बत का !!!!

नहीं डरते ज़माने से, तेरा ये गम ही काफी है !
सुना है गम मोहब्बत का, बड़ा गमगीन होता है !!
डरे रहते हैं हर पल हम, तेरे इस दर्द को लेकर !
सुना है गम जुदाई का, बड़ा संगीन होता है !!
कई रंगों से मिलकर के, बना है गम मोहब्बत का !
सुना है रंग मोहब्बत का, बड़ा रंगीन होता है !!


जितेन्द्र सिंह बघेल 
12th दिसम्बर 2012

मोहब्बत !!!!

मोहब्बत ही तो किया था, अपनी जली ज़िन्दगी को बुझाने को !
उन्होंने भी क्या खूब सिला दिया, कहके, क्या जरूरत थी मेरी ज़िन्दगी में आने को !!
किसी के इश्क की खुशबु, मैं पता था तेरे अन्दर !
खुदी की जिल्लतों में भी, खुदी को डूब जाने को !!
तू हो ही तो  नहीं पाया, तेरा जो था ज़माने में !
यही कहकर जलाया है, मेरे बेबस से अरमाँ को !!

Tuesday, 11 December 2012

आदतें........

कभी - कभी कुछ मजबूरियाँ आदत बन जाती हैं !
हम समझ ही नहीं पाते, कब वो इबादत बन जाती हैं !!
दर्द तब होता है यारो, जब दुआ भी बददुआ बन जाती हैं !
ज़िन्दगी भी एक कोलाहल है यारो,
यहाँ तो शक्लें भी बेअकल हो जातीं हैं !!
ज़माने लग जाते है एक रिश्ते को बनाने में,
ये आदतें भी कभी - कभी बुरी बन जाती हैं !!!!!!!!


          जितेन्द्र सिंह बघेल 
       11th दिसम्बर 2012

Monday, 10 December 2012

मन का अपराध !!!

कुछ बचा नहीं है करने को, मन में है एक अपराध बोध ! 
है यही सोंच कर मन व्याकुल, जीवन से बड़ा न कोई बोझ !! 
कुछ लोग मिले जीवन में क्यों, हूँ रहा अभी भी यही सोंच ! 
जाना शायद नियति उनकी, है अभी रहा है यही सोंच !! 
हैं बृक्ष बड़े कुछ अम्बर तक, जिनकी सीमा का अंत नहीं !
 ये मन भी लगे कुछ ऐसा ही, जिसकी सीमा का अंत वही !!
 इसकी सीमा में घुस जाना, है लगे मुझे अपराध बड़ा ! 
होके भी न इसका हो पाऊं, इसका बौद्धिक स्तर है बड़ा !! 
जीवन की नित्य निरंतरता, है कहे मुझे कुछ नया सोंच ! 
कैसे बुद्धी को समझाउं, जो मना करे कुछ नहीं सोंच !! 
कुछ बचा नहीं है करने को, मन में है एक अपराध बोध ! 
है यही सोंच कर मन व्याकुल, जीवन से बड़ा न कोई बोझ !! 
                

जितेन्द्र सिंह बघेल 
 10th दिसम्बर 2012

Wednesday, 5 December 2012

साहेब !!!!

मेरी बातें भी अब उनको लगे हैं, जुल्म सी साहेब !
मेरा दिल भी बेचारा है, हुआ न अब तलक वाकिफ !!
उन्हें तो आदतें सी  हैं, सनम का दिल जलाने  की !
बेचारी आदतों को अब, कोई समझाये क्या साहेब !!




 जितेन्द्र सिंह बघेल
5th  दिसम्बर 2012 

।। जगत विधाता मोहन।।

क्यों डरना जब हांक रहा रथ, मेरा जगत विधाता मोहन... सब कुछ लुट जाने पर भी, सब कुछ मिल जाया करता है। आश बनी रहने से ही, महाभारत जीता जाता है।।...