ये जो ज़िंदगी है ना, आधी तो बंदगी में गुजार दी ।
कभी ऊपर वाले की, तो कभी नीचे वालों की ॥
.
जितेंद्र शिवराज सिंह बघेल
11th मई 2018
जब नींद ना आये तो कुछ लिखना चाहिये.....
ये जो ज़िंदगी है ना, आधी तो बंदगी में गुजार दी ।
कभी ऊपर वाले की, तो कभी नीचे वालों की ॥
.
जितेंद्र शिवराज सिंह बघेल
11th मई 2018
जब नींद ना आये तो कुछ लिखना चाहिये.....
ये ज़िंदगी, तू इतने कह कहे क्यों लगा रखी है,
तुझे बर्दाश्त नहीं, तुझसे रोज लड़ना झगड़ना मेरा !
कभी तू भी, दे दिया कर तवज्जो किसी काम का,
हर वक्त, हर दम बस एक नया पंगा होता है तेरा !!
तुझसे मोहब्बत तो नहीं हो सकती ये यकीन है,
हाँ, नफ़रत के क़ाबिल भी तो नहीं मिज़ाज तेरा !!
जितेंद्र शिवराज सिंह बघेल
(वाराणसी यात्रा )
26th अप्रैल 2018
कुछ रंगों से रंगना चाहूँ, कुछ रंगहीन सम्बन्धों को !
कुछ निर्मल जल लेना चाहूँ, धुलने को मैले चेहरों को !!
मर्यादित और प्रखर भी हूँ, हैं कई द्वंद्व बस कहने को !
हर व्यक्ति यहाँ क्यूँ बेबस है, है जीता बस है खाने को !!
व्यथा कहूँ या व्यथा सुनूँ, कोई खड़ा नहीं कह सुनने को! है मर्म बहुत ही मलिन मेरा, कोई लफ्ज़ नहीं अब कहने को !!
जितेंद्र शिवराज सिंह बघेल
25th अप्रैल 2018
बहुत सुलझा दिया है, वक्त ने हरकतें कर करके,
वरना एक वक्त था, की सारा वक्त गुजरता था हरकतों में !
जितेंद्र शिवराज सिंह बघेल
20th अप्रैल 2018
मैं ग़मों को बेवकूफ़ बनाना सीख लिया, कहीं ऐसा तो नहीं की ज़िंदगी का तज़ुर्बा सीख लिया ! था बदतर अब बेहतर हो लिया, लगता है सच और झूँठ का अंतर समझ लिया !!
.
जितेंद्र शिवराज सिंह बघेल
5th अप्रैल 2018
पुरुषार्थ और पुरुष के बीच एक घमासान क्यूँ चल रहा है भाई ?
आप पुरुष हैं न !
फ़िर क्योँ बेवज़ह प्रदर्शन किया जा रहा !
अपनी विचारधारा, अपनी व्यक्तिगत भड़ास तो नहीँ हो सकती न, दोनो किसी भी रूप में एक दूसरे की पूरक या समकक्ष भी तो नहीँ हैं ।
एक ऐसी हवा हमारे जोश मेँ क्योँ घुल रही है जो, बस बिना विचार किये, एक ऐसे लक्ष्य की ओर अग्रसर सी है, जिसे पाके भी सब कुछ खोने का भान होने वाला है। देश की नयी ऊर्जा को देश हित मे लगाना है, न की उसे खोना है।
सच के साथ, सच के पास, सच के लिये जीना ही सर्वश्रेष्ठ है,
सबसे पहले देश, फ़िर समाज, फ़िर परिवार, फ़िर आप स्वयं ॥
मेरे मन की आवाज़ ........
॥ जितेन्द्र शिवराज सिँह बघेल ॥
25th फ़रवरी 2018
किसी के वाश्ते जीना, किसी के वाश्ते मरना !
नहीँ होता नसीबों मे, यूँ मर मर के यूँ जीना !!
दफ़न होने से पहले ही, कफ़न की आरज़ू क्योँ थी !
कशिश वैसी अभी भी है, कशिश पहले भी जैसी थी !!
फरक इतना है बस आया, की तुझको पास हूँ पाया !
वफ़ा का वास्ता देकर, वफ़ा के पार मैं आया !!
किसी के वाश्ते जीना, किसी के वाश्ते मरना !
नहीँ होता नसीबों मे, यूँ मर मर के यूँ जीना !!
॥ जितेन्द्र शिवराज सिंह बघेल ॥
25 th फ़रवरी 2018
क्यों डरना जब हांक रहा रथ, मेरा जगत विधाता मोहन... सब कुछ लुट जाने पर भी, सब कुछ मिल जाया करता है। आश बनी रहने से ही, महाभारत जीता जाता है।।...