Wednesday, 12 December 2012

गम मोहब्बत का !!!!

नहीं डरते ज़माने से, तेरा ये गम ही काफी है !
सुना है गम मोहब्बत का, बड़ा गमगीन होता है !!
डरे रहते हैं हर पल हम, तेरे इस दर्द को लेकर !
सुना है गम जुदाई का, बड़ा संगीन होता है !!
कई रंगों से मिलकर के, बना है गम मोहब्बत का !
सुना है रंग मोहब्बत का, बड़ा रंगीन होता है !!


जितेन्द्र सिंह बघेल 
12th दिसम्बर 2012

मोहब्बत !!!!

मोहब्बत ही तो किया था, अपनी जली ज़िन्दगी को बुझाने को !
उन्होंने भी क्या खूब सिला दिया, कहके, क्या जरूरत थी मेरी ज़िन्दगी में आने को !!
किसी के इश्क की खुशबु, मैं पता था तेरे अन्दर !
खुदी की जिल्लतों में भी, खुदी को डूब जाने को !!
तू हो ही तो  नहीं पाया, तेरा जो था ज़माने में !
यही कहकर जलाया है, मेरे बेबस से अरमाँ को !!

Tuesday, 11 December 2012

आदतें........

कभी - कभी कुछ मजबूरियाँ आदत बन जाती हैं !
हम समझ ही नहीं पाते, कब वो इबादत बन जाती हैं !!
दर्द तब होता है यारो, जब दुआ भी बददुआ बन जाती हैं !
ज़िन्दगी भी एक कोलाहल है यारो,
यहाँ तो शक्लें भी बेअकल हो जातीं हैं !!
ज़माने लग जाते है एक रिश्ते को बनाने में,
ये आदतें भी कभी - कभी बुरी बन जाती हैं !!!!!!!!


          जितेन्द्र सिंह बघेल 
       11th दिसम्बर 2012

Monday, 10 December 2012

मन का अपराध !!!

कुछ बचा नहीं है करने को, मन में है एक अपराध बोध ! 
है यही सोंच कर मन व्याकुल, जीवन से बड़ा न कोई बोझ !! 
कुछ लोग मिले जीवन में क्यों, हूँ रहा अभी भी यही सोंच ! 
जाना शायद नियति उनकी, है अभी रहा है यही सोंच !! 
हैं बृक्ष बड़े कुछ अम्बर तक, जिनकी सीमा का अंत नहीं !
 ये मन भी लगे कुछ ऐसा ही, जिसकी सीमा का अंत वही !!
 इसकी सीमा में घुस जाना, है लगे मुझे अपराध बड़ा ! 
होके भी न इसका हो पाऊं, इसका बौद्धिक स्तर है बड़ा !! 
जीवन की नित्य निरंतरता, है कहे मुझे कुछ नया सोंच ! 
कैसे बुद्धी को समझाउं, जो मना करे कुछ नहीं सोंच !! 
कुछ बचा नहीं है करने को, मन में है एक अपराध बोध ! 
है यही सोंच कर मन व्याकुल, जीवन से बड़ा न कोई बोझ !! 
                

जितेन्द्र सिंह बघेल 
 10th दिसम्बर 2012

Wednesday, 5 December 2012

साहेब !!!!

मेरी बातें भी अब उनको लगे हैं, जुल्म सी साहेब !
मेरा दिल भी बेचारा है, हुआ न अब तलक वाकिफ !!
उन्हें तो आदतें सी  हैं, सनम का दिल जलाने  की !
बेचारी आदतों को अब, कोई समझाये क्या साहेब !!




 जितेन्द्र सिंह बघेल
5th  दिसम्बर 2012 

Friday, 23 November 2012

सफ़र जिंदगी का !!!!

ये सफ़र जिंदगी का कटता नहीं क्यों,
न जाने इसे क्यों जिए जा रहे हैं !!
जो  लम्हे सुहाने लगे थे कभी,
जिन्हें भूल जाना मुनासिब नहीं है !!
न पूंछो मेरी ज़िन्दगी के सफ़र को,
कई गलतियों को छुपाये हुए हैं !!










वो गलती गुनाहों सी लगने लगी क्यों,
जिन्हें दिल में अब तक छुपाये हुए हैं !!
ये सफ़र जिंदगी का कटता नहीं क्यों,
न जाने इसे क्यों जिए जा रहे हैं !!

       जितेन्द्र सिंह बघेल 
     24th नवम्बर  2012

Thursday, 1 November 2012

स्त्री का दिल !!!!!

स्त्री का दिल इकलौता ऐसा मुल्क है
जहां मैं दाख़िल हो सकता हूं बग़ैर किसी पासपोर्ट के
कोई पुलिसवाला नहीं मांगता
मेरा पहचान-कार्ड
न ही लेता है तलाशी
उलट-पुलट कर मेरे सूटकेस की
जिसमें ठूंस - ठूंस कर भरी गई हैं
ग़ैरक़ानूनी ख़ुशियां
प्रतिबन्धित कविताएं
और रसीली तकलीफ़ें

स्त्री का दिल इकलौता ऐसा मुल्क है
जो ज़खीरे नहीं बनाता मारक-हथियारों के
न ही झोंकता है अपने लोगों को
लड़ने के लिए
ख़ुद की छेड़ी लडाइयां

।। जगत विधाता मोहन।।

क्यों डरना जब हांक रहा रथ, मेरा जगत विधाता मोहन... सब कुछ लुट जाने पर भी, सब कुछ मिल जाया करता है। आश बनी रहने से ही, महाभारत जीता जाता है।।...