Tuesday, 22 May 2012

कभी दिल से पुछा ही नहीं मैंने, की तू इतना पत्थर दिल क्यों है !
जिसे मैं नाजुक समझता था, वो इतना जाहिल क्यों है !!
मत कर ऐसा, गुनाह हो जाएगा,
मुझे समझाने वाला आज, गुमसुम सा क्यों है !!
आज भी काँप जाता है जिस्म सारा,
उसके लबों पे मेरे लिए दर्द क्यों है !!
कभी डरता था दुनिया से, 
की वो इतनी पागल क्यों है !!
अभी लड़ता हूँ मैं खुद से,
वो मुझसे दूर अब  क्यों है !!
कभी चर्चे मोहब्बत के, मेरे यूँ आम होते थे,
अभी दुनिया मोहब्बत की, मेरी बदनाम सी क्यों है !!
उसी के जिक्र में जिन्दा है, मेरी मोहब्बत अब,
वो आएगा मेरे घर में, अजब ये आस सी क्यों है !!
बचा कुछ भी नहीं है अब, तेरे - मेरे फ़साने में,
ना जाने दिल मेरा तुझको, करता याद अब क्यों है !!
कभी दिल से पुछा ही नहीं मैंने, की तू इतना पत्थर दिल क्यों है !
जिसे मैं नाजुक समझता था, वो इतना जाहिल क्यों है !!
                                                
                                                जितेन्द्र सिंह बघेल 
                                                   22 मई 2012 
 
 
 

Wednesday, 16 May 2012

आज क्यों मुझे, मेरा बचपन याद आ रहा है !
मानो मेरे इस जले दिल को और जला रहा है !!
शर्म आती है मुझको, गुजरता हूँ जब !
कोई कहता है ये, की तू कहाँ  जा रहा है !!
वो गलियां है मेरी, कहानी है कहती !
जहा से मेरा, ये बचपन आ रहा है !!
मुझे क्यों नहीं अब, बुलाता है बरगद !
वो यूँ ही मुझे बस, घूरे जा रहा है !!
शायद परेशां  है, फितरत से मेरी !
इसी कसमकस से लड़ा जा रहा है !!
मेरे रोम होते, खड़े क्यों ही जाते !
मेरा ही जमीर, क्यों मुझे हिला रहा है !!
आज क्यों मुझे, मेरा बचपन याद आ रहा है !
मानो मेरे इस जले दिल को और जला रहा है !!
आज क्यों मुझे, मेरा बचपन ..................
                           जितेद्र सिंह बघेल 
                            "16 मई 2012"

Monday, 14 May 2012

निकला था जमाने को बदलने, कब जमाने ने मुझी को बदल दिया !
मैं बैठा था एक दिन यूँ ही, की मेरी परछाई ने  मुझ से ही सवाल कर दिया !!
तू क्यों आया इस जमाने में जहाँ, कातिल हैं सारे लोग,
करेंगे काम कुछ ऐसे, की खो देगा तू भी होश !!
मैं समझ ही नहीं पाया की, कैसे दूँ गिला इसको,
भले ही अब नुमाइश को, क्यों न  लाये मुझको लोग !!
मैं आया था कुछ सपने सजाने, जमाने ने मुझे ही सजा दिया !
निकला था जमाने को बदलने, कब जमाने ने मुझी को बदल दिया !!
                                                       जितेंद्र सिंह बघेल 
                                                         15  मई 2012 
 


Friday, 11 May 2012

तू जैसी थी वैसी आज भी है,
मेरा हर रोम तेरा मोहताज़ आज भी है !!
कभी भटका जो राहों में, तो रुखसत होती है यूँ, 
पलट के कहती है मुझसे , तू बच्चा आज भी क्यों  है !!
मेरी हर सांस कहती है, माँ तू जाना ना  दूर,
करूँ  कैसे मैं  शिकवा, मेरा अरमान तू ही है !!
तेरे आँचल की छाया में, मैं सोना  चाहता हूँ अब,
तुझे समझाऊं कैसे मैं, मेरा जहां तू ही है !!
जिया हर पल को मैंने यूँ ,
लगा तेरा हाथ सर पे है ,
तुझे बतलाऊं कैसे मैं , तू जैसी थी वैसी है !!
                    -जितेंद्र सिंह बघेल 
                       "12 मई 2012"
इस ब्रहमांड की सभी पूजनीय माताओं को मेरा चरण स्पर्श प्रणाम...

Thursday, 10 May 2012

मेरे दिल की कशिश समझो , तो जानू मैं की हस्ती हो....
किसी पे जान लुटा देना, मेरी फितरत में शामिल है !!
वो समझे तो कभी मेरी मोहब्बत की, सदाओं को ....
उसे समझा नहीं पाया, जो मेरे दिल के काबिल है !!
वो पागल है या काफिर है, उसे समझा नहीं सकता...
मेरे सपने वो बुनती है, उन्ही की खुद वो कातिल है !!
मेरे दीवानेपन की वो मुअक्किल बन नहीं सकती...
उसे समझा नहीं पाया, जो मेरी खुद की कातिल है !!
                             - जितेन्द्र सिंह बघेल 
                                11 मई 2012, 
कभी -कभी मैं सोंचता हूँ , के मैं फ़साने ढूँढता हूँ,
मगर मोहब्बत करने का जरिया तो हो !
किसी पे ऐतबार करने को दिल चाहता है,
मगर मेरी मोहब्बत पे ऐतबार तो किसी को हो!
ज़िन्दगी यूँ ही जिए जा रहे दर -बदर,
किसी पे सदके जाने का दिल तो हो!
                                 - जितेंद्र  सिंह बघेल 
 
Zindagi ki haqeekat se samna jb hoga, tb khud ko sambhalenge.
Yahi soncha karte the jb, jawani ki taraf bad rhe the.
Ye zawani bhi aa gyi, jo aani thi yaaro,
kisi ko hansaye to kisi ko rulaye...
Yahi sonch kr bad rhe the..
hume kya pta ye raasta hai dard ka,
kab chale is per, kab mazboor ho gye,
Kisi ne kaha tha aise hi rahana, jaise mere saatha rahte ho,
fir ye duniya kahti hai, kyo itna dard sahte ho.
Kuch to fikar thi meri, mere sanam ko,
warna kaun sanjhata hai kisi be-raham ko.
Usi ki fitrat ne sikha diya jeene ka bahana,
nahi mai kaun hun,kya hun,kaise jaan pata ye jamana.
Ab jeene ki aaezoo nahi rahi yaaro, mere sanam ne mujhe bula liya,
kaun kahta hai mer ker pyar nahi hota, maine is sach ko jhoontha bana diya.....

-Jitendra Singh Baghel...19th April,2012

।। जगत विधाता मोहन।।

क्यों डरना जब हांक रहा रथ, मेरा जगत विधाता मोहन... सब कुछ लुट जाने पर भी, सब कुछ मिल जाया करता है। आश बनी रहने से ही, महाभारत जीता जाता है।।...