Thursday, 7 February 2013

मैं ईश्वर भीरु नहीं हूँ..!!

मैं ईश्वर भीरु नहीं हूँ. भय ईश्वर तक नहीं ले जाता है. उसे पाने की भूमिका अभय है !
मैं किसी अर्थ में श्रद्धालु भी नहीं हूँ. श्रद्धा मात्र अंधी होती है. और अंधापन परम सत्य तक कैसे ले जा सकता है?

मैं किसी धर्म का अनुयायी भी नहीं हूँ, क्योंकि धर्म को विशेषणों में बाटना संभव नहीं है. वह एक और अभिव्यक्त है.!

कल जब मैंने यह कहा तो किसी ने पूछा, “फिर क्या आप नास्तिक हैं?”

मै न नास्तिक हूँ, न आस्तिक ही. वे भेद सतही और बौद्धिक हैं. सत्ता से उनका कोई संबंध नहीं है. सत्ता ‘है’ और ‘न है’ में विभक्त नहीं है. भेद मन का है, इसलिए नास्तिकता और आस्तिकता दोनों मानसिक हैं. आत्मा को वे नहीं पहुंच पाती हैं. आत्मिक विधेय और नकार दोनों का अतिक्रमण कर जाता है.

‘जो है’ वह विधेय और नकार के अतीत है. या फिर वे दोनों एक हैं और उनमें कोई भेद-रेखा नहीं है. बुद्धि से स्वीकार की गई किसी भी धारण की वहाँ कोई गति नहीं है.

वस्तुत: आस्तिक को आस्तिकता छोड़नी होती है और नास्तिक को नास्तिकता, तब कहीं वे सत्य में प्रवेश कर पाते हैं. वे दोनों ही बुद्धि के आग्रह हैं. आग्रह आरोपण हैं. सत्य कैसा है, यह निर्णय नहीं करना होता है; वरन अपने को खोलते ही वह जैसा है, उसका दर्शन हो जाता है.

यह स्मरण रखें कि सत्य का निर्णय नहीं, दर्शन करना होता है. जो सब बौद्धिक निर्णय छोड़ देता है, जो सब तार्किक धारणाएं छोड़ देता है, जो समस्त मानसिक आग्रह और अनुमान छोड़ देता है, वह उस निर्दोष चित्त-स्थिति में सत्य के प्रति अपने के खोल रहा है, जैसे फूल प्रकाश के प्रति अपने को खोलते हैं.

इस खोलने में दर्शन की घटना संभव होती है.

इसलिए, जो न आस्तिक है न नास्तिक है, उसे मैं धार्मिक कहता हूँ. धार्मिकता भेद से अभेद में छलांग है.

विचार जहाँ नहीं, निर्विचार है; विकल्प जहाँ नहीं, निर्विकल्प है; शब्द जहाँ नहीं, शून्य है- वहाँ धर्म में प्रवेश है.

अतः हे महामनाओ !!!
मत बांटो हमे, इस देश को मत बांटों धर्म और जातिगता से, अपने निजी स्वार्थ हेतु !
कदाचित तुम्हे ज्ञान नहीं है "ओबेसी और तोगड़िया" की इंसान केवल इंसान है, सब तो एक सा है क्या अलग है या भिन्न है बता दो !!

किसी भी धर्म  की आस्था को ठेस पहुँचाना या उसका अपमान करना किसी भी धर्म की श्रेस्ठतम ग्रन्थ या पवित्र पुस्तक में नहीं लिखा है !!

बेवक़ूफ़ हैं ऐसे लोग जो ऐसे बहकाबे में आ जाते हैं !!

जितेन्द्र सिंह बघेल

8th फरवरी 2013

Saturday, 2 February 2013

मेरा खालीपन !!!!!!!!!!!!

यादों के बादल बरस चुके, अब बंजरपन अपनापन है !
हर बूँदें हैं बस स्याह रात, खाली खाली  अब जीवन है !!

गरमी की गरमाहट भी अब, है कष्ट नहीं दे पाती है !
ठंडी की सिकुड़न में भी वो, मुझ में उबाल सा लाती है !!

जन्नत की शोहरत फीकी है, बिन उसके ऐसा जीवन है !
यादों के बादल बरस चुके, अब बंजरपन अपनापन है !!

हर सावन मुझसे कहता है, हर पतझड़ मुझसे कहता है !
हर मौसम तेरे साथ थी वो, तू कहने से क्यों डरता है !!

बस बात यही हर मौसम की, भरती मेरा खालीपन है !
यादों के बादल बरस चुके, अब बंजरपन अपनापन है !! 

जितेन्द्र सिंह बघेल 
2nd फ़रवरी 2013
 

Monday, 28 January 2013

जीवन का सच !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

जीवन का सच भी, क्या सच है, जिसने इस सच को बोल दिया !
जीवन के इस मझधार में खुद, अपनी नईया को डुबा दिया !!

सच बोलो तो बुरे बनो, फिर लोग कहें क्यों सच बोलो !
सच का मतलब समझो यारों, फिर तभी कहो की सच बोलो !!



कुछ सच मानो पछतावे से, जिनके कहने से दर्द हुआ !
तो बंद करो पछताना अब, जो बोल दिया तो बोल दिया !!

जीवन का सच भी, क्या सच है, जिसने इस सच को बोल दिया !
जीवन के इस मझधार में खुद, अपनी नईया को डुबा दिया !!


हर शख्स यहाँ पे झूँठा है, हर चेहरे मानो नकली है !
जीवन की करवट ऐसी है, की मानो एक पहेली है !!

ये सच भी कितना कड़वा है, सारे रिश्तों को तोड़ दिया !
है लानत ऐसे सच में भी, जिसने रश्मों को तोड़ दिया !!

जीवन का सच भी, क्या सच है, जिसने इस सच को बोल दिया !
जीवन के इस मझधार में खुद, अपनी नईया को डुबा दिया !
!


जितेन्द्र सिंह बघेल

28th जनवरी 2013

Thursday, 24 January 2013

हर कोशिश नाकाम हुई, तेरी दुनिया से जाने की !!

 हर कोशिश नाकाम हुई, तेरी दुनिया से जाने की !
 राहें भी गुमनाम हुई, तेरे मंजिल तक आने की !!

लब काँप रहे, मन भाँप रहे, दिल करता है अपने मन की !
हैरान रहूँ, बेचैन रहूँ, बातें सुनता मन से मन की !!

कुछ रोज लगे बीते बीते, पर बात नहीं अफ़साने की !
ये दिल भी पागल न समझे, जो बात नहीं समझाने की !!

अब टीस सी दिल में उठती है, उसके कोमल स्पर्शों की !
धड़कन भी मुझे डराती हैं, कहती हैं बारी जाने की !!

 हर कोशिश नाकाम हुई, तेरी दुनिया से जाने की !
 राहें भी गुमनाम हुई, तेरे मंजिल तक आने की !!



जितेन्द्र सिंह बघेल
25th जनवरी 2013

Tuesday, 22 January 2013

ये ज़िन्दगी, कब जुदा होगी तू !!!!!!!

ये ज़िन्दगी, कब जुदा होगी तू ,
तेरे रहमों करम से मैं, घबरा गया !!

रह सकूँ गर तेरे दायरे में जो मैं,
खुद के साये से भी मैं तो घबरा गया !!

मेरे अपनों को अपना कहूँ जब भी मैं,
मेरा अपना कोई याद आता गया !!

ये ज़िन्दगी, कब जुदा होगी तू ,
तेरे रहमों करम से मैं, घबरा गया !!





जितेन्द्र सिंह बघेल
23 rd जनवरी 2013

Monday, 21 January 2013

ये लोग दीवाने कैसे हैं

नज़रों से ओझल होते ही, पलकों के अन्दर होते हैं !
ये लोग दीवाने कैसे हैं, कोपल से कोमल होतें हैं !!

सारे वादों से दूर गया, फिर यादों में क्यों आते हैं !
आँखों के निर्झर झरने में, वो अंतर्मन को धोतें हैं !!

उनकी दुनिया अब अलग हुई, फिर धड़कन में क्यों बसते हैं !
ये लोग दीवाने कैसे हैं, कोपल से कोमल होतें हैं !!

मेरी यादों के पहलू कुछ, क्यों आज मुझी पे हँसते हैं !
तेरी किस्मत में यार नहीं, सब यही बोल के हँसते हैं !!

हैं मगर ऩाज खुद में मुझको, वो मेरे दिल में बसते हैं !
ये लोग दीवाने कैसे हैं, कोपल से कोमल होतें हैं !!

मेरी इच्छाएं मरी नहीं, बस आत्मशुद्धि ही करते हैं !
ये जीवन भी क्षणभंगुर है, सब मरने से ही डरते हैं !!

सारे बंधन से मुक्त रहूँ, बस यही जतन हम करते हैं !
ये लोग दीवाने कैसे हैं, कोपल से कोमल होतें हैं !
!




                                     जितेन्द्र सिंह बघेल 

                                             22 nd जनवरी 2013

Saturday, 19 January 2013

यादों का मौसम

कुछ लम्हे हूँ जिया हुआ,  जिनकी यादें तडपाती हैं !
है बीते पल में जिंदा वो, बस यही याद कहलाती है !!

यादों का मौसम कैसा है, जो दूर कभी ना जाता है !
जब याद उसे मैं करता हूँ, मन दूर तलक यूँ जाता है !!

है बेबस सा लाचार बड़ा, मन को यादें समझाती हैं !
एक आश बची है मन में क्यों, आँखें  नम सी  हो जाती हैं !!

कुछ लम्हे हूँ जिया हुआ,  जिनकी यादें तडपाती हैं !
है बीते पल में जिंदा वो, बस यही याद कहलाती है !!



             जितेन्द्र सिंह बघेल 
            19 January 2013

।। जगत विधाता मोहन।।

क्यों डरना जब हांक रहा रथ, मेरा जगत विधाता मोहन... सब कुछ लुट जाने पर भी, सब कुछ मिल जाया करता है। आश बनी रहने से ही, महाभारत जीता जाता है।।...