Wednesday, 14 October 2015

जय माता की

नव रोज़ बड़े ही पावन हैं, नवनीत बना दे मन मेरा !
कोइ पाप न हो मेरे कर से, बस एक यही वरदान मेरा !!
तेरी भक्ती कर पाऊँ नित, रज धूल तेरी चंदन मेरा !
सारी चिंता से रहूँ परे, बस चरन तेरे हों घर मेरा !!
हे माँ मेरी मुझे मुक्त तू कर, जीवन उद्धार तू कर मेरा !
इस मोह जाल से विघटित कर , यहाँ न मैं कुछ न कोई मेरा !!
नव रोज़ बड़े ही पावन हैं, नवनीत बना दे मन मेरा !
कोइ पाप न हो मेरे कर से, बस एक यही वरदान मेरा !!
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जितेंद्र शिवराजसिंह बघेल
15 October 2015
     जय माता की

Sunday, 11 October 2015

संशय !!

कोहरा सा छाया रहता है, मन के कुंठित कोनो में !
हर सुबह उसे डर रहता है, खुदकी कुंठा को खोने में !!

संशय !!

कोहरा सा छाया रहता है, मन के कुंठित कोनो में !
हर सुबह उसे डर रहता है, खुदकी कुंठा को खोने में !!

Monday, 28 September 2015

बेसब्री का आलम !!!!

बेसब्री का आलम कुछ यूँ था यारो,  जिन रास्तों पे चले थे कभी, आज उनमें ही भटकने लगे !!!
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जितेंद्र शिवराजसिंह बघेल
29 सितम्बर 2015

Sunday, 13 September 2015

सुकूँ सारा गवाँ बैठा !!

सुकूँ पाने की कोशिश में, सुकूँ सारा गवाँ बैठा !
न समझा आजतक जीना, जो मर मर के हैं जीते लोग !!
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कदम ठहरे नहीं मेरे, न थक के मैं  कभी बैठा !
न समझा आजतक कहना, जो छुप छुप के हैं कहते लोग !!
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नहीं किस्मत की है रहमत, या किस्मत से मैं लड़ बैठा !
कहीं सच ही न हो जाये, जिसे सह भी न पायें लोग !!
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सुकूँ पाने की कोशिश में, सुकूँ सारा गवाँ बैठा !
न समझा आजतक जीना, जो मर मर के हैं जीते लोग !!
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जितेंद्र शिवराज सिंह बघेल 

14th सितम्बर 2015 

Thursday, 10 September 2015

अदब से आदाब तक !!

बड़ा लंबा सफर था मेरा, अदब से आदाब तक का !
ना रास्ते कम हुए, ना मंजिल मिली !!
बड़ा मसगूल था मैं, न सोंचा उस हद तक का !
ना दर्द कम हुए, न खुशियाँ मिली !!

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जितेंद्र शिवराज सिंह बघेल 
11th सितम्बर 2015 

Tuesday, 8 September 2015

खून का रंग लेके, क्यों रोये तु आँख !!

खून का रंग लेके, क्यों रोये तु आँख !
क्या तुझे तेरे रोने का मकसद मिला !!
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है जरूरी अगर सुर्ख होना तेरा !
फिर खतम आज से सारा शिकवा गिला !!
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रूह, जख्मों का मंजर लिए चल रही !
कोई उसको न उसके जैसा मिला !!
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हर सितम सह  के जीना मोहब्बत नहीं !
हर मोहब्बत को उसका सिला न मिला !!
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खून का रंग लेके, क्यों रोये तु आँख !
क्या तुझे तेरे रोने का मकसद मिला !!
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जितेंद्र शिवराज सिंह बघेल 
   8th सितम्बर 2015 

।। जगत विधाता मोहन।।

क्यों डरना जब हांक रहा रथ, मेरा जगत विधाता मोहन... सब कुछ लुट जाने पर भी, सब कुछ मिल जाया करता है। आश बनी रहने से ही, महाभारत जीता जाता है।।...