Monday, 21 January 2013

ये लोग दीवाने कैसे हैं

नज़रों से ओझल होते ही, पलकों के अन्दर होते हैं !
ये लोग दीवाने कैसे हैं, कोपल से कोमल होतें हैं !!

सारे वादों से दूर गया, फिर यादों में क्यों आते हैं !
आँखों के निर्झर झरने में, वो अंतर्मन को धोतें हैं !!

उनकी दुनिया अब अलग हुई, फिर धड़कन में क्यों बसते हैं !
ये लोग दीवाने कैसे हैं, कोपल से कोमल होतें हैं !!

मेरी यादों के पहलू कुछ, क्यों आज मुझी पे हँसते हैं !
तेरी किस्मत में यार नहीं, सब यही बोल के हँसते हैं !!

हैं मगर ऩाज खुद में मुझको, वो मेरे दिल में बसते हैं !
ये लोग दीवाने कैसे हैं, कोपल से कोमल होतें हैं !!

मेरी इच्छाएं मरी नहीं, बस आत्मशुद्धि ही करते हैं !
ये जीवन भी क्षणभंगुर है, सब मरने से ही डरते हैं !!

सारे बंधन से मुक्त रहूँ, बस यही जतन हम करते हैं !
ये लोग दीवाने कैसे हैं, कोपल से कोमल होतें हैं !
!




                                     जितेन्द्र सिंह बघेल 

                                             22 nd जनवरी 2013

Saturday, 19 January 2013

यादों का मौसम

कुछ लम्हे हूँ जिया हुआ,  जिनकी यादें तडपाती हैं !
है बीते पल में जिंदा वो, बस यही याद कहलाती है !!

यादों का मौसम कैसा है, जो दूर कभी ना जाता है !
जब याद उसे मैं करता हूँ, मन दूर तलक यूँ जाता है !!

है बेबस सा लाचार बड़ा, मन को यादें समझाती हैं !
एक आश बची है मन में क्यों, आँखें  नम सी  हो जाती हैं !!

कुछ लम्हे हूँ जिया हुआ,  जिनकी यादें तडपाती हैं !
है बीते पल में जिंदा वो, बस यही याद कहलाती है !!



             जितेन्द्र सिंह बघेल 
            19 January 2013

Thursday, 17 January 2013

तेरी यादें

मिलूं मैं गर जो राहों में, छुपा लेना खुदी को तुम !

मुझे मालुम है ये की, तड़प के रो पडोगी तुम !!

तेरी यादें भी आती हैं, बड़ी सिद्धत से यूँ जाना !

तुम्हे बतलाऊं मैं कैसे, उन्ही से लड़ पडोगी तुम !!

  

                                     जितेन्द्र सिंह बघेल  

                                      17 January 2013

 

Wednesday, 9 January 2013

हकीकत की बयाँबाजी

कभी फ़ुरसत से पढना तुम, मेरी आँखों के अश्कों को !
जिन्हें लाये बिना आँखें, मेरी अब सो नहीं पाती !!

कभी ख्वाबों में आऊं तो, समझ लेना बुरा सपना !
हकीकत की बयाँबाजी, ये आँखें कह नहीं पाती !!

मुझे बाँधा है कसमों से, न जाने किस बहाने से !
मेरी हर बात भी अब तो, उसे समझा नहीं पाती !!

जितेन्द्र सिंह बघेल 

9th  जनवरी 2013

Wednesday, 2 January 2013

ये रात बड़ी जहरी लगती

ये रात बड़ी जहरी लगती, जब ख्वाब में तू नहीं आती है !
ये आँख भी खुद से हैं कहतीं , क्या रात अभी भी बाकी है !!
ये सफ़र रात का लगता है, जैसे बिन पानी का सागर !
हर रात उसी में डूबे मन, पिछली सुध में खुद को पाकर !!
ये सफ़र रात का खोता है, कब आँख मेरी लग जातीं है !
जब सुबह में खुद को पाता हूँ, तब आँख मेरी भर आतीं हैं !!
ये रात बड़ी जहरी लगती, जब ख्वाब में तू नहीं आती है !
ये आँख भी खुद से हैं कहतीं , क्या रात अभी भी बाकी है !!
है गुजर रहा जीवन ऐसे, जैसे जीना मजबूरी है !
है बात करूं कितनी उसकी, हर बातें अभी अधूरी हैं !!
हर हाल में तुझको जीना है, बस यही बात तडपाती है !
जाते - जाते वो यही कही, यह बात समझ नहीं आती है !!
ये रात बड़ी जहरी लगती, जब ख्वाब में तू नहीं आती है !
ये आँख भी खुद से हैं कहतीं , क्या रात अभी भी बाकी है !!


     जितेन्द्र सिंह बघेल   

2nd जनवरी 2013



Wednesday, 26 December 2012

हम कौन थे, क्या हो गये हैं

मुझे आज आचार्य चाणक्य का एक सुंदर एवं सत्य कथन बहुत ही जादा विचलित कर रहा है ......

"जिस देश के युवा ये कहते हैं, की हमे राजनीति में कोई रूचि नहीं है, उस देश को भ्रष्टाचार एवं पतन से कोई नही बचा सकता"

आज जरूरत है आचार्य जी के इस सत्य को मान कर उसे चरितार्थ करने की !
मुझे तो दुःख है की सत्ता में बिपक्ष में बैठी भारतीय जनता पार्टी की सरकार, अब तक अपने बिपक्ष होने के किसी भी पहलू को पूरा न कर सकी, इस पार्टी की एक ही विचारधारा मुझे अब तक समझ आई है, केवल और केवल भावनात्मक प्रहार करना !
आज इस प्रहार से कहीं जादा जरूरी है, तल्कालीन मुद्दों पे अपनी विचारधारा को मोड़ना एवं तत्कालीन सत्ताधारी सरकार को घेरना, शुरूआती दौर में ये पार्टी ऐसा ही करती है, मगर खुद के दामन के दागों की वजह से मुद्दों से भटक जाती है !
कांग्रेस पार्टी की तो ये पुरानी आदत और नसल है की, जिस समय उन पर कोई भी आरोप लगाओ उसी समय उसी आरोप की  प्रतिलिपि वो आप पर जरूर छाप देती है, ये भी एक विशेषता है इस पार्टी की, जिसकी ही वजह से सायद ये कायम भी है !
यह एक सोंचनीय विषय है की तत्कालीन सरकार निरंतर न्योता दे - दे के घोटाले किये जा रही है, महंगाई बढाये जा रही है, मगर अफ़सोस की दूसरी सबसे मजबूत पार्टी भारतीय जनता पार्टी कुछ नही कर सकी, बाकी क्षेत्रीय दलों की क्या बिसात !

अब तक अटल जी की जगह कोई नहीं ले पाया, अब्दुल कलाम जी को भी सिरे से नकार दिया गया,
वाह रे किस्मत इस देश की, जिनके दामन में खुद भ्रष्टाचार के दाग हैं,
वो ही देश के प्रथम नागरिक, महामहिम राष्ट्रपति के पद पर आसीन हैं !
द्वितीय नागरिक की तो बात ही क्या करूं, वो तो सर्व विदित है, उन्हें तो खुद ही नही पता की मैं कैसे आया हूँ और कैसे चल रहा हूँ और देश को भी कैसे चला रहा हूँ !!

कोटि कोटि नमन है देश के क्रांतिकारियों को जिन्होंने हमे इसे दुसरे देश की गुलामी के चंगुल से छुडा कर अपने ही देश में गुलाम बना दिया !!!
आचार्य मैथिलीशरण गुप्त ने अपनी रचना में लिखा है, जो बहुत ही सत्य है, जो ये बता रहा है की किस सोंच की विभूति थे वो महामना ......
हम कौन थे, क्या हो गये हैं, और क्या होंगे अभी !
आओ विचारें आज मिल कर, यह समस्याएं सभी !!
भू लोक का गौरव, प्रकृति का पुण्य लीला स्थल कहां !
फैला मनोहर गिरि हिमालय, और गंगाजल कहां !!


                                                              जितेन्द्र सिंह बघेल
                                                               27 दिसम्बर 2012

Tuesday, 25 December 2012

ममता का भण्डार

इसके कई रूप हैं,
एक लड़की ....
एक बहेन ....
एक पत्नी ....
एक माँ ....


ममता का भण्डार है तू, कुछ कर्ज चुकाना चाहूँ मैं !
है अंतर्मन भी बड़ा दुखी, कैसे तुझको बतलाऊं मैं !!
तेरे सीने का दर्द मेरे, सीने में कैसे आएगा !
बस यही सोंच में पागल हूँ, कैसे खुद को सुलझाऊं मैं !!



                                             -जितेन्द्र सिंह बघेल
                                             26th दिसम्बर 2012

।। जगत विधाता मोहन।।

क्यों डरना जब हांक रहा रथ, मेरा जगत विधाता मोहन... सब कुछ लुट जाने पर भी, सब कुछ मिल जाया करता है। आश बनी रहने से ही, महाभारत जीता जाता है।।...