Wednesday, 25 September 2024

।।विरह वेदना।।

सोने का मृग चाहिए तो, विछड़न भी होगा जान प्रिये।
कर्तव्य परायण होना तो, उपहास का भान भी जान प्रिये।।
कुछ भी कहके जाये कोई, प्रतिउत्तर को भी खोज प्रिये।
वरना चढ़ने को अग्निवेदि में, तत्पर रहना तुम सीघ्र प्रिये।।
सीधी सीढ़ी अब नही रही, टेढ़ा होना भी सीख प्रिये।
खुद की ज्वाला में खूब जली, अब ज्वाला बन तू जला प्रिये।।
कपट, दंभ के बादल हैं, बरबस उनको बरसा तू प्रिये।
तेरी गर्जन में वो बल है, हरगिज़ इसको बिसरा न प्रिये।।
मरना अब रावण तेरे से, तू कूटनीति भी सीख प्रिये।
अब राम बिना भी जीवन है, इस जीवन को जीना है प्रिये।।

जितेंद्र शिवराज सिंह बघेल 
 26 सितंबर 2024

Wednesday, 18 September 2024

आज की पीढ़ी का मर्म

देखता हूं कुछ नौजवानों को,
अक्सर उनकी टोपी उड़ जाया करती है रास्ते में।
थोड़ा आगे रोकते हैं, 
अपनी अजीब सी बाइक, 
की उठा सकें अपनी गिरी टोपी,
मगर रौंद जाता है कोई कमबख्त हरहजा उसे ।।
देखता हूं कईयों को सेल्फ (बिना किक मारे स्टार्ट होना) वाली रॉयल इनफील्ड में भी।
कभी रास्ते में हुई ख़राब तो पैर नहीं थाम पाते,
कौन समझाए इन झींगुरों को,
की बड़ा होना पड़ता है भारी भरकम को संभाल पाने के लिए।।
देखता हूं बीस लाख की मोटर कार वालों को भी।
बीस रुपए के टोल के लिए बकर करते,
उनको अपनी औकात से अपनी ही औकात में गिरते।।
जो छोटा है वो बड़ा होने का दावा किए जा रहा है,
क्या मसला है कि, खुद के जहर को दवा समझे जा रहा है।
मिलावट सी हो गई है हर नस्ल में अब,
किसे इस्तेमाल करें, किस पर विश्वास करें,
सब कुछ बस धोखा हुआ जा रहा है।।

जितेंद्र शिवराज सिंह बघेल 
सितंबर 2024

Tuesday, 23 May 2023

।। मेरे शहर में सब है ।।

मेरे शहर में सब है,
बस नही है तो, वो महक...
जो सुबह होते ही, मेरे गांव के हर घर से आती थी।
थोड़ी सोंधी, मटमैली, जो अंतर्मन में घुल जाती थी।।
मेरे शहर में सब है,
बस नही है तो, वो महक...
जो मेरे मां के आंचल से आती थी।
थोडा रसोई, थोडा दूध मक्खन,
इनकी महक तो मां ने ही बताई थी।।
मेरे शहर में सब है,
बस नही है तो, वो महक...
जो बारिश की बूंदों के पड़ने से आती थीं।
घर की छप्पर पर फैले, कद्दू और लौकी की बौलें,
लगता था की पास बुलाकर, खुद को सुंघाती थीं।।
मेरे शहर में सब है,
बस नही है तो, वो महक...
जो बियारी के लिए तैयार होते चूल्हों से आती थीं।
सुबह सुबह गोबर से लीपी दीवारें भी, पास बुलाती थीं।।
मेरे शहर में सब है,
बस नही है तो, वो महक...

जितेंद्र शिवराज सिंह बघेल
  24th मई 2023


Friday, 12 May 2023

।।कर्नाटक विधानसभा चुनाव २०२३।।

तबायफें भी होंगी, मंडियां भी सजेंगी ।
बिकेंगे विधायक, बलि राजनीती की चढ़ेंगी ।।
होगा चीरहरण मर्यादा का, कई द्रोपादियां भी होंगी।
रहेंगे कौरव, रहेंगे पांडव, भीष्मों की आंखे फिर भी बंद होंगी ।।
तबायफें भी होंगी, मंडियां भी सजेंगी ।
बिकेंगे विधायक, बलि राजनीती की चढ़ेंगी ।।

#karnatakaelection2023 
#karnatakaassemblyelection2023 

Thursday, 11 May 2023

।। रास्ते।।

कहीं से आ रहा था मैं,
कहीं से जा रहा था मैं ।
जो पहले थी मेरी मंजिल,
वहीं से जा रहा था मैं ।।
हजारों रास्ते तय कर,
निरंतर चल रहा हूं मैं ।
हजारों रास्ते जिनको,
बिछड़ कर रो रहा हूं मैं ।।
कहीं से आ रहा था मैं.......
यही चकिया है जीवन का,
यही अपना रहा हूं मैं ।
बहुत ही कम समय मे मैं,
अधिक सा खो रहा हूं मैं।।
कहीं से आ रहा था मैं.......

।।जितेंद्र शिवराज सिंह बघेल।।

।। पुंज।।

मैं धर्म से अधर्म तक की, प्रार्थना का पुंज हूँ !
मैं व्यक्ति हूँ, विशेष हूँ, मनुष्य हूँ, मनुष्य हूँ !!
सभी चराचरों का मैं, श्रेष्ठतम वो बिंदु हूँ !
जिसे नहीँ धरा का मोह, विनाश का वो द्वन्द हूँ !!
मैं मन्दिरों की घंट से, निकल रहा वो स्वर भी हूँ !
मैं मस्जिदों से आ रही, अजान का भी राग हूँ !!
हूँ एकमात्र श्रेष्ठ मैं, सृजन से अब भी शीर्ष हूँ !
हूँ बुद्धि से प्रखर बहुत, विवेक का मैं शंकु हूँ !!
मैं भूल कर हूँ बढ़ रहा, जिस ब्रह्म का मैं अंश हूँ !
मैं लालची मैं दुष्ट हूँ, मैं ही कपट मैं दंभ हूँ !!
मैं धर्म से अधर्म तक की, प्रार्थना का पुंज हूँ !
मैं व्यक्ति हूँ, विशेष हूँ, मनुष्य हूँ, मनुष्य हूँ !!
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हम मनुष्य जाति समस्त ब्रह्मांड की सर्वोच्च चर अचर इकाई हैं, परंतु हम अपने ज्ञान और विवेक के दम्भ में चूर होके निरंतर मानवता के ही विनाश कि ओर बढ़ रहे, प्रकृति से हमने जंग छेड़ दी है, अपने ही अपनों के रक्त के प्यासे हैं, कदाचित थोड़ा भी भान होता कि ईश्वर ने हमें किसलिये बनाया है, क्यों बुद्धि प्रदान कि, इसलिये कि उसकी ही सत्ता के विरुद्ध युद्ध शुरू करदें !!
🙏
जितेन्द्र शिवराज सिंह बघेल
     1st मई 2017

।। मैं।।

यूँ तो हूँ अभ्यष्यत मैं, हूँ तनिक अनभिज्ञ भी !
राह में हूँ घुस चला, फ़िर नही डर मात्र भी !!
हैं हज़ारों द्वेष और, हैं करोड़ों कपट भी !
लड़ रहा हूँ मैं निरंतर, थक नहीँ सकता कभी !!
बुद्धि होती नित प्रखर, हैं कर्म मेरे रत अभी !
मन हो रहा नित प्रति प्रफुल्लित, है नहीँ थकना कभी !!
यूँ तो हूँ अभ्यष्यत मैं, हूँ तनिक  अनभिज्ञ भी !
राह में हूँ घुस चला, फ़िर नही डर मात्र भी !!
जितेंद्र शिवराज सिंह बघेल 
28th अप्रैल 2017

।। जगत विधाता मोहन।।

क्यों डरना जब हांक रहा रथ, मेरा जगत विधाता मोहन... सब कुछ लुट जाने पर भी, सब कुछ मिल जाया करता है। आश बनी रहने से ही, महाभारत जीता जाता है।।...